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तलाक किसे कहते है, त़लाक़ का शरई़ ह़ुक्म (Talak kya hai,Talak Ka Sharai Hukm)






Talak kya hai, Talak Ka Sharai Hukm:

(तलाक किसे कहते है, त़लाक़ का शरई़ ह़ुक्म) :

निकाह़ से जहां दो अजनबी एक होते हैं वहीं उस रिश्ते को तोड़ देने का नाम तलाक़ है,



हदीस शरीफ़: हुज़ूर सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं, के तमाम हलाल चीज़ों में अल्लाह को सबसे ज़्यादा ना पसन्द तलाक़ है,

📚अबू दाऊद, जिल्द 1, सफह 296

हालांके Talak एक जाइज़ चीज़ है मगर इसका इस्तेमाल खास दुशवारियों और परेशानियों में करने का ही हुक्म है ये नहीं के बात बात में शौहर अपनी बीवी को तलाक़ देता रहे,क्योंके अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआने मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है:

क़ुरआन: फिर अगर वो तुम्हें पसंद ना आयें तो क़रीब है के कोई चीज़ तुम्हें ना पसंद हो और अल्लाह उसमें बहुत भलाई रखे,

📚 पारा 4,सूरह निसा,आयत 19)

मतलब ये है के कोई इंसान सिर्फ ऐबों का मुजस्समा तो नहीं हो सकता अगर उसमें कुछ बुराई होगी तो अच्छाई भी ज़रूर होगी तो अगर औरत में ऐसी कोई खराबी नज़र भी आती है तो शौहर को उसकी खूबियों पर भी नज़र करनी चाहिए, लेकिन अगर फिर भी तलाक़ की नौबत आ ही जाए तो एक ही तलाक़ देनी चाहिए ताके सुलह समझौते का रास्ता खुला रहे, जैसा के अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआने मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है

क़ुरआन : तलाक़ दो बार तक है फिर भलाई के साथ रोक लेना है या भलाई के साथ छोड़ देना फिर अगर शौहर ने उसे तलाक़ (तीसरी) दी तो अब वो औरत उसे हलाल ना होगी यहां तक के दूसरे शौहर के पास रहे,

📚 पारा 1, सूरह बक़र, आयत 229, 230)




(1) Talak E Rajai (तलाक़े रजई) - वो तलाक़ है के औरत फिलहाल निकाह से नहीं निकलती, हां इद्दत गुज़र जाए और वापस ना लाये तो बाहर हो जाएगी शौहर को इद्दत के अंदर बग़ैर निकाह के उसे लौटाने का हक़ रहता है,

(2) Talak E Baeen (तलाक़े बाइन) - वो तलाक़ है कि औरत निकाह से तो फौरन निकल जाती है मगर औरत की मर्ज़ी से शौहर फिर उसे निकाह में ला सकता है इद्दत के अंदर हो या इद्दत के बाद,

(3) Talak E Mugallaza (तला मुगल्लज़ा) - वो तलाक़ है के औरत निकाह से फौरन बाहर हो गयी अब बग़ैर हलाला के उसके लिए हलाल ना होगी, मुगल्लज़ा तीन तलाक़ों से होता है अब ये तीन चाहें बरसों के फासले पर दी हों मसलन एक 20 साल पहले दी फिर कुछ दिन बाद एक और देदी अब जब भी तीसरी बार कहेगा तो मुगल्लज़ा हो जायेगी, या फिर इकठ्ठा दी यानि यूं कहा के मैंने तुझको तलाक़ दी, तलाक़ दी, तलाक़ दी, या यूं कहा के मैंने तुझको 3 तलाक़ दी तो हर सूरत में मुगल्लज़ा वाक़ेय हो जायेगी, क्योंके रब ने तीनों तलाक़ों का हुक़्म बयान किया मगर कोई शर्त नहीं लगाई के एक ही मजलिस में हो या अलग अलग, और इस हुक्म की तामील हुज़ूर सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम के ज़माना ए मुबारक से हो रहा है जैसा कि सहाबिया ए रसूल हज़रत फातिमा बिन्ते क़ैस रज़िअल्लाहु तआला अन्हा अपना तलाक़ का वाक़िया बयान करती हैं के,

🔶मेरे शौहर (हज़रत आमिर शोअबी रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) ने मुझे यमन के लिए घर से निकलते वक़्त इकठ्ठी 3 तलाक़ दी तो अल्लाह के रसूल सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम ने तीनो तलाक़ नाफिज़ फरमा दी,

📚 इब्ने माजा,सफह 147,



🔶इसी तरह 1 साथ 3 तलाक़ों का कई मुआमला ज़माना ए नब्वी में पेश आया जिस पर आपने 3 तलाक़ों का ही हुक्म दिया, और बाद के मुहद्दिसीन हज़रात ने भी इसी पर अमल किया जिसके लिए काफी हवाले मौजूद हैं मसलन,

📚 अबू दाऊद, जिल्द 1,सफह 300)

📚 मोत्ता इमाम मालिक,सफह 284)
📚 ताहावी, जिल्द 2,सफह 33)
📚 फत्हुल क़दीर, जिल्द 3,सफह 469)
📚 अहकामुल क़ुरआन, जिल्द 1, सफह 388)

🔶हां ये अलग बात है की इकट्ठी 3 तलाक़ देना गुनाह है और हालते हैज़ व हालते हमल में तलाक़ देना नाजाइज़ है इस पर हुज़ूर ने नाराज़गी का इज़हार भी किया मगर फरमाते हैं के अगर हालते हैज़ में भी 3 तलाक़ दी तो तीनो नाफिज़ हो जायेंगी लेकिन अगर तीन नहीं दी तो रजअत यानी लौटाए, दोबारा उसको निकाह में लाना वाजिब है,

📚 दारेक़ुतनी,जिल्द 2,सफह 433)
📚 फतावा रज़वियह,जिल्द 5,सफह 604)

🔶औरत नमाज़ नहीं पढ़ती, शौहर के लिए बनाव सिंगार नहीं करती, शौहर को या घर वालों को तंग करती है इन सूरतों में तलाक़ दे सकते हैं यूंही अगर शौहर जिमअ (सेक्स) पर क़ादिर नहीं या कोई फराइज़ से औरत को रोकता है तो औरत तलाक़ ले सकती है,

📚 बहारे शरीयत, हिस्सा 8, सफह 5)



Halala Kise Kahte Hai, Halala Ka Sharai Masla:

अब अगर मुगल्लज़ा हो गयी तो बग़ैर हलाला के औरत शौहर पर हलाल ना होगी,मतलब ये के चूंके तलाक़ दी है तो तलाक़ की इद्दत गुज़ारेगी जो के 3 हैज़ है अब ये हैज़ चाहे तीन महीनों में आए या फिर तीन साल में, 3 हैज़ आ गए इद्दत पूरी हो गयी या फिर हमल से थी तो हैज़ तो आएगा नहीं तो अब बच्चे की विलादत ही इद्दत है अब अगर बच्चा तलाक़ देने के 1 दिन बाद ही हो जाए इद्दत पूरी हो गयी अब वो दूसरे से निकाह करेगी उससे सोहबत होगी फिर वो तलाक़ देगा तो फिर उसकी इद्दत गुज़ारेगी यानि फिर से 3 हैज़, अब पहले शौहर से निकाह कर सकती है, अगरचे देखने में ये क़ानून सख्त है मगर इससे भी ज़्यादा सख़्त ये है के एक मर्द सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है मगर अपनी बीवी को ग़ैर के बिस्तर में नहीं बर्दाश्त कर सकता, तो ये सज़ा अस्ल में उस मर्द के लिए है के जिसने शरीयत को मज़ाक बनाया के अगर चाहता तो एक तलाक़ देकर फिर से रुजू कर सकता था मगर उसने ऐसा नहीं किया और अपनी बहादुरी समझते हुए या अपनी जिहालत में 3 क्या कइयों तलाक़ दे बैठा तो अब शरीयत से खेलने का अंजाम भी बर्दाश्त करे,ये भी याद रहे कि दूसरे शौहर से सिर्फ निकाह करके तलाक़ ले लेने से वो निकाह नहीं होगा बल्के एक बार सोहबत करनी फर्ज़ होगी, और ये भी याद रहे के अगर बग़ैर हलाला किये शौहर ने अपनी बीवी को रखा तो जो कुछ होगा सब ज़िना खालिस होगा और बच्चे सब हरामी पैदा होंगे,

📚 बहारे शरीयत,हिस्सा 8,सफह 126)

अब जिस मसअले पर क़ुरआन हदीस और इज्माअ सबका मुत्तफिक़ फैसला हो उस पर कुछ जाहिलों की वजह से हुक्म ए शरअ से इन्कार नहीं किया जा सकता और क़यामत तक उसमें फेर बदल भी नामुमकिन है,चाहे कुछ नाम निहाद मुसलमान हों या फिर काफिरो मुर्तद लोग जो भी इसमें फेर बदल की कोशिश करेगा वो ज़िल्लतों रुस्वाई के गढ़े में समा जाएगा,अल्लाह ने जो क़ानून हमारे लिए बनाया है उसमें बिला शुबा भलाई ही भलाई है,जो जाहिल औरतें आज modern बनकर आज़ादी का हक़ मांग रहीं हैं वो जाकर ग़ैर मुस्लिमों की औरतों का हाल देखें फिर फैसला करें,

वो देखें के गैरों के मुक़ाबले इस्लाम में तलाक़ का % कितना है,

देखें के ग़ैरों के मुकाबले इस्लाम में rape (ज़िना) का % कितना है,

देखें के ग़ैरों के मुकाबले इस्लाम में कितनी बच्चियों को पेट मे मारा जाता है,

देखें के ग़ैरों के मुकाबले इस्लाम में कितनी बहुओं को जिंदा जलाया जाता है

देखें के ग़ैरों के यहां कितना हक़ औरतों को हासिल है और इस्लाम में कितना

लिहाज़ा ऐसी बे ग़ैरत औरतों और जाहिल मर्दों और ऐसी सरकार की कोई भी बात या क़ानून जो के इस्लाम के ख़िलाफ़ हो,
हरगिज़,
हरगिज़,
हरगिज़ हम ईमान वालों को मंज़ूर नहीं

*तलाक़ की तफ्सीली मालूमात के लिए बहारे शरीयत हिस्सा 8 का मुताला किया जाए*

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