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झूठ बोलने वाला जहन्नमी हैं (SACH BOLNE WALA QAYAMAT KE DIN ANBIYA, SIDDIQUEEN, AUR SHAHIDO KE SATH HOGA )


झूंठ बोलना कैसा ? (Islam Me Jhooth Bolna Kaisa Hai ?)


सच बोलने की कैसी अज़ीम अहमियत है कि इन्सान अपनी सच्चाई के ज़रिए जन्नत में दाख़िल हो सकता है जो हर इन्सान की पहली और आख़िरी ख़्वाहिश है, जबकि झूंठ बोलने की वजह से इन्सान को जहन्नम की दहकती हुई आग में जलना होगा अगर मौत से क़ब्ल हक़ीक़ी तौबा नहीं की। ज़ाहिर है कि हर इन्सान चाहता है कि वह दोज़ख से बच जाये। 

क़यामत तक आने वाले इन्सानों व जिनों के नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जन्नत के हुसूल और जहन्नम से निजात के लिए बताया कि अल्लाह तआला के दीगर अहकाम को बजा लाकर सच बोलने को अपने ऊपर लाज़िम कर लें।  

JHOOTH BOLKAR KHARIDNE YA BECHNE SE BARKAT KHATM HO JATI HAI :


➤ हज़रत हकीम बिन हिज़ाम रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: फरोख़्त करने वाले और ख़रीदार को इख़्तियार है जब तक वह मजलिस से जुदा ना हों। अगर दोनों ने हक़ीक़त को ना छुपाया और सच बोला तो उनकी ख़रीद व फरोख़्त में बरकत डाल दी जायेगी और अगर हक़ीक़त को छुपाया और झूठ बोला तो ख़रीद व फरोख़्त की बरकत ख़त्म हो जायेगी।

📚(बुख़ारी व मुस्लिम)

इन दिनों हमने तिजारत को ख़ालिस दुनियादारी का काम समझ लिया है, इसलिए हमारा यह ज़ेहन बन गया है कि झूंठ और धोखाधड़ी के बग़ैर अब तिजारत कामयाब नहीं हो सकती। हालांकि अगर तिजारत अल्लाह के ख़ौफ़ के साथ की जाये और किसी को धोखा देने की ग़र्ज़ से नहीं बल्कि सच्चाई और अमानतदारी को अपना मामूल बनाकर की जाये और नाज़ाइज कामों से परहेज़ किया जाये तो यही तिजारत इबादत बनेगी और हलाल तिजारत के ज़रिए हासिल शुदा रक्म को अपने और घरवालों के ऊपर ख़र्च करने पर अजरे अज़ीम मिलेगा और उसकी वजह से हमें आख़िरत में कामयाबी हासिल होगी इंशाअल्लाह जैसा कि 



➤ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: “जो ताजिर सच्चा और अमानतदार हो वह क़यामत के दिन अंबिया, सिद्दीकीन और शहीदों के साथ होगा। (JO SACHCHA AUR AMANATDAR HOGA VO KAYAMAT KE DIN ANBIYA, SIDDIQUEEN, AUR SHAHIDO KE SATH HOGA)

यह हदीस मुख़्तिलफ़ कुतुबे हदीस में मौज़ूद है, इसकी सनद पर कुछ उलमा ने कलाम किया है, लेकिन यह हदीस अच्छे मायने और मफ़हूम अपने अन्दर लिए हुए है। लिहाज़ा हमें कारोबार में भी कभी झूंठ नहीं बोलना चाहिए।


आख़िरी हदीस में बयान किया गया कि ख़रीद व फरोख़्त करने वालों को मजलिस से जुदा होने से क़ब्ल अपने फैसले से रजूअ करने यानि ख़रीद व फरोख़्त को मन्सूख़ करने का हक़ रहता है। लेकिन मजलिस से जुदा होने के बाद ख़रीद व फरोख़्त मुकम्मल हो जाती है, अब बेचने वाले को यह इख़्तियार नहीं कि यह कहे कि मैं इस चीज़ को नहीं बेचना चाहता या ख़रीदार कहे कि मैं इस चीज़ को ख़रीदना नहीं चाहता। हाँ दोनों अपनी रजामंदी से इस डील को ख़त्म कर सकते हैं। अगर बेचने वाला चीज़ की क़ाबिले ज़िक्र कमियों को छुपाकर कोई चीज़ फरोख़्त करे या ख़रीदने वाला धोखा देने का इरादा रखता हो तो ख़रीद व फरोख़्त में कैसे बरकत हो सकती है? इसलिए हमें चाहिए कि हम ख़रीद व फरोख़्त में भी झूंठ का सहारा ना लें बल्कि हमेशा सच ही बोलें। हमारे असलाफ़ ने हमेशा सच बोलकर तिजारत की, इसलिए हर मैदान में कामयाब हुए। शहरे मक्का मुकर्रमा की मशहूर ताजिरा हज़रत ख़दीजा ररदियल्लाहु तआला अन्हा ने सबसे अफ़जल बशर हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तिजारत में दयानतदारी को देखकर ही तो निकाह का पैग़ाम भेजा था।


Jo Baat Shaq Me Mubtala Ho Usko Chhod De:

➤ हज़रत हसन बिन अली रदियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि मुझे हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की यह बातें याद हैं: जो बात शक में मुबतला करे उसको छोड़ दो और उसको इख़्तियार कर जो शक में ना डाले। सच्चाई इत्मीनान है और झूंठ शक है।

📚(तिर्मिज़ी शरीफ)


यानि जिसके हलाल होने में शक हो उसको छोड़ दो और उसको इख़्तियार करे जिसमें कोई शक व शुबह ना हो। और हमें झूंठ का सहारा नहीं लेना चाहिए, सिर्फ़ और सिर्फ़ सच ही बोलना चाहिए। एक झूंठ को सही साबित करने के लिए मुतअद्दद झूंठ बोलने पड़ते हैं, लिहाज़ा हम सिर्फ़ सच बात ही कहें।

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