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एक गलतफहमी : रमज़ान का आखिरी जुमा और क़ज़ा ए उम्री नमाज़, ज्यादा से ज्यादा शेयर करे....





RAMZAN KA AKHIRI JUMA AUR QAZA NAMAZ (रमज़ान का आखिरी जुमा और क़ज़ा नमाज़) :

कुछ लोग इस गलत फहमी में मुब्तला हैं के रमज़ान के आखिरी जुमे को चंद रकअतें पढ़ने से पूरी उम्र की क़ज़ा नमाज़ें मुआफ़ हो जाती है। बाज़ जगहों पर तो इस का खास एहतेमाम भी किया जाता है के मानो कोई बम्पर ऑफर आया हो।



ऐसा ऑफर देखने के बाद वो लोग जिन की बीस तीस साल की नमाज़ें क़ज़ा है, अपने जज़्बात पर काबू नही कर पाते और असल जाने बिग़ैर इस पर यकीन कर लेते हैं। इस तरह की बातें बिल्कुल गलत हैं और इन की कोई असल नही है, उलमा-ए-अहले सुन्नत ने इस का रद्द किया है और इसे नाजायज़ क़रार दिया है।

▶️ इमाम -ए- अहले सुन्नत,आला हज़रत रहिमहुल्लाहू त'आला इस के मुताल्लिक़ लिखते हैं के ये जाहिलों की ईजाद और महज़ नाजायज़ व बातिल है।
(انظر: فتاوی رضویہ، ج7، ص53، ط رضا فاؤنڈیشن لاہور)



▶️ इमाम -ए- अहले सुन्नत एक दूसरे मकाम पर लिखते हैं के आखिरी जुमु'आ में इस का पढ़ना इख़्तिरा किया गया है और इस में ये समझा जाता है के इस नमाज़ से उम्र भर की अपनी और अपने माँ बाप की भी क़ज़ाये उतर जाती है महज़ बातिल व बिदअत -ए- शनिआ है, किसी मोतबर किताब में इस का असलन निशान नही।
(ایضاً، ص418، 419)

▶️ हुज़ूर सदरुश्शरिआ हज़रत अल्लामा मुफ़्ती अमजद अली आज़मी रहिमहुल्लाहू त'आला लिखते है के शबे क़द्र या रमज़ान के आखिरी जुमे को जो ये क़ज़ा -ए- उमरी जमा'अत से पढ़ते हैं और ये समझते है के उम्र भर की क़ज़ाये इसी एक नमाज़ से अदा हो गयी, ये बातिल महज़ है।
(بہار شریعت، ج1، ح4، ص708، قضا نماز کا بیان)

▶️ हज़रत अल्लामा शरीफुल हक़ अमजदी अलैहिर्रहमा ने भी इस का रद्द किया है और इस कि ताईद में पेश की जाने वाली रिवायात को अल्लामा मुल्ला अली क़ारी हनफ़ी अलैहिर्रहमा के हवाले से मौज़ू क़रार दिया है।
(فتاوی امجدیہ، ج1، ص272، 273)

▶️ अल्लामा क़ाज़ी शमशुद्दीन अहमद अलैहिर्रहमा लिखते है: के बाज़ लोग शबे क़द्र या आखिरी रमज़ान में जो नमाज़े क़ज़ा -ए- उमरी के नाम से पढ़ते है और ये समझते है के उम्र भर की क़ज़ाओ के लिए ये काफी है, ये बिल्कुल गलत और बातिल महज़ है।
(قانون شریعت، ص241)



▶️ हज़रत अल्लामा मुफ़्ती मुहम्मद वक़ारूद्दीन क़ादरी रज़वी अलैहिर्रहमा लिखते है: के बाज़ इलाक़ो में जो ये मशहूर है के रमज़ान के आखिरी जुमे को चंद रकाअत नमाज़ क़ज़ा -ए- उमरी की निय्यत से पढ़ते है और ख़याल ये किया जाता है के ये पूरी उम्र की क़ज़ा नमाज़ो के क़ायम मकाम है, ये गलत है...., जितनी भी नमाज़े क़ज़ा हुई है उन को अलग अलग पढ़ना ज़रूरी है।
(وقار الفتاوی، ج2، ص134)

▶️ हज़रत अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहिमहुल्लाहू त'आला लिखते है: के बाज़ अनपढ़ लोगो मे मशहूर है के रमज़ान के आखरी जुमा'आ को एक दिन की पांच नमाज़े वित्र समेत पढ़ ली जाए तो सारी उम्र की क़ज़ा नमाज़े अदा हो जाती है और इस को क़ज़ा -ए- उमरी कहते है, ये क़तअन बातिल है। 

रमज़ान की खुसूसियत, फ़ज़ीलत और अज्रो सवाब की ज़्यादती एक अलग बात है लेकिन एक दिन की क़ज़ा नमाज़े पढ़ने से एक दिन की ही अदा होगी, सारी उम्र की अदा नही होगी।
(شرح صحیح مسلم، ج2، ص352)

साबित हुआ के ऐसी कोई नमाज़ नही है जिसे पढ़ने से पूरी उम्र की क़ज़ा नमाज़ अदा हो जाये।


ये जो नमाज़ पढ़ी जाती है, इस कि कोई असल नही है, ये नाजायज़ ओ बातिल है।

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